Copy Tracking Code dekho ! chankya FREE Social Promotion

Wednesday, 5 November 2025

Blogging from the Tajmahal city Agra

Thursday, 21 January 2016

 स्वार्थी  वनाम परमार्थी 
   लोग स्वार्थी बनने से पता नहीं क्यों डरते हैं ? जबकि मेरा मैं   विस्तीर्ण  होता जा रहा  हैं  लेकिन  अगर  मैं  ही नहीं होता , तो  क्या मैं  

Tuesday, 2 June 2015

समाज या भेड़

   समाज  या  भेड़  




              पीरियड ख़ाली था, क्लास मे किसी से बात करने का मन  नहीं था,  मन मे  अंतर्द्वंदो  ने हाहाकार  मचाया हुआ था  ।  तभी पता  नहीं कहीं  से मेरी दुश्मन आ  गई ।  " ना - ना " दुश्मन से आप  गलत  अर्थ  ना  निकाले, मेरी सबसे अच्छी  सहेली अमिता , उसे ही मै  अपना दुश्मन कहती हूँ । आते ही पीछे से जब धौंल पड़ा  मेरी पीठ पर और मेरा चश्मा आँख से नाक पर आ गया । तब मेरे होश वर्तमान मे  आये । और मै उसकी तरफ पागलों-सी देखने लगी । अचानक आवाज़ को भारी करते हुए बोली ," क्यों बे , कहाँ खो गया था ? आज तो चोरी करते हुए पकड़ा गया । और बिना मेरी  बात को सुने हाथ को पकड़कर उठाते हुए बोली ," तुम भी क्या इन बोरिंग लड़कियों मे बैठी हो ? " चलो , कहीं किसी खाली कोने मे बैठते हैं । " मैं बिना कुछ बोले , चुपचाप उसके साथ चल दी । मैं अपने मे खोये - खोये कॉलेज के किस कोने मे आ गयी , पता ही नहीं चला । होश, मुझे तब आया , जब उसने मुझे बैठाते हुए बड़े अदब के साथ झुकते हुए बोला ," हुज़ूर , गुलाम आपसे यहाँ बैठने की इल्तज़ा कर सकता है । " मेरे चेहरे  पे हल्की -सी मुस्कान उभरी और मैं बैठ गयी । लेकिन इतना ध्यान फिर भी न था कि इसने क्या कहा है और जो कहा है, वह ठीक कहा है । शायद आज अमिता भी असमंजस मे पड़ गई । क्योंकि इतना चुप रहने वालों मे से , मैं भी नहीं हूँ । इसलिए वह वक़्त की नज़ाकत को समझते हुए गंभीर स्वर मे बोली, ' जया , आखिर बात क्या है ? " मेरा हाथ एक घास के तिनके के साथ खेल रहा था और निगाहें  भी वहीँ अटकी हुयी थी । बड़ा जोर लगाकर बस इतना ही बोल पाई , " कुछ नहीं " । और पता नहीं क्या हुआ कि  मेरी आँखों मे आँसू आ गये । पता नहीं, शायद बहुत दिनों की भंड़ास, किसी अपने के पास  की नज़दीकी  या पता नहीं किस कारण । जैसे ही अमिता ने मेरे आँसू  देखे,  उसका चेहरा उतर गया । और दोनों हाथों के बीच मेरा हाथ दबाते हुए बोली ," जया, तुम्हें मेरी कसम, बात बताओ , क्या है ? क्या घर में कोई बात हो गयी या-----------और वाक्य अधूरा छोड़ दिया । मैंने इतनी देर मे , स्वयं को कहीं तक नियन्त्रित कर लिया था । मैं धीरे -से बोली, " ना, घर की कोई बात नहीं है । बस ऐसे ही दिल भर आया था । " फिर जल्दी से बोली ," तुझसे मिले भी तो कई दिन हो गये । शायद  मैं विषय बदलना चाहती थी । लेकिन वो तो मेरी पक्की दुश्मन निकली, ताड़ गयी मेरी कमजोरी और बोली , " तेरे मंजनू ने तो कोई  नाटक नहीं कर दिया । " अचानक मैंने अपना हाथ उसके हाथ से झटक लिया और उसकी तरफ त्यौरियां चढ़ाकर तर्जनी ऊँगली दिखाती  हुई बोली, " ऐं, उनके बारे मे  कुछ नहीं बोलेगी,  समझी ।" उनके बारे मे  ! उनननननन के कहते -कहते , उसने जो हँसना शुरू किया , तो रुकने का नाम ही न ले ।  मेरा दिल और जल-भुन गया । फिर अचानक मेरे पास आकर , आँख दबाई और गर्दन उचकाकर  बोली," वो उनके  कब से हो गए । मैं झुँझलाकर बोली , " प्लीज मज़ाक छोड़ो । मेरी जान पर बन रही है और तुझे छेड़ने मे  मज़ा आ रहा है । " अनायास मैंने गंभीर होकर कहा , " अच्छा , ये बता , तुझे अगर अवसर मिले तो प्रेम विवाह करेगी या पारम्परिक ? " मेरे अचानक ऐसे प्रश्न करने  पर, वो अचकचा गयी । मेरे प्रश्न का मन्तव्य या पता नहीं कुछ और थोड़ी देर तक सोचती रही । और बोली। " तू कौन-सा विवाह कर रही है ?" मैं बे-झिझक  बोली, " प्रेम-विवाह ",।  " कब ?" लेकिन मैं उसका प्रश्न अनसुना करते  हुए बोली, " लेकिन मेरे सामने एक समस्या है और जो अक्सर इस प्रकार के विवाहों मे आती है ।" उसने पूछा, " क्या " ? मैंने उत्तर दिया, " प्रेम विवाह हो या पारम्परिक विवाह, विवाह तो विवाह है लेकिन समाज प्रेम विवाह को  पचा क्यों नहीं पता ? " वह बोली," तुमने स्वंयम ही उत्तर दे दिया, क्योंकि यह प्रेम विवाह है । " लेकिन है तो  विवाह ही ना । " मैंने  प्रत्युत्तर  दिया । अमिता  थोड़ी ठहरी और बोली, " पारम्परिक विवाह मे, प्रेम बाद मे  होता है विवाह पहले । जबकि प्रेम विवाह मे, प्रेम पहले और विवाह बाद मे । " "आखिर इससे कुछ फर्फ तो पड़ता नहीं । कान चाहेँ इधर से पकड़ो या उधर से । लेकिन समाज प्रेम विवाह के विरुद्ध क्यों है ? तुम्हेँ पता है ? बिना उसे देखे  और बिना उसके उत्तर देने की परवाह किये, मैं अपनी आँख शून्य मे टिकाते हुए बोली, " समाज, यह तथाकथित समाज, भेडों के समूह के समान है । और यहाँ कोई भेड़ अपना रास्ता खुद तय करे, यह समाज कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता । क्योंकि अगर प्रत्येक भेड़ अपना रास्ता खुद तलाश कर, उस पर चलने लगे, तो जिसे हम समाज कहते है, वह रह कहाँ जायेगा ? इसलिए जब भी कोई भेड़ अपना रास्ता बनाने लगती है तो जिस समाज को प्रसन्न होना चाहिए था कि कोई हिम्मतवर है जो अकेले जाने का सहस कर रहा है उसे प्रोत्साहित करना चाहिए था  । उसे वे लोग दबाने लगते है, प्रताडित करते है, धिक्कारते है, अपने निहित स्वार्थवश व्यक्ति को कुंठित करने लगते हैं । " शायद अमिता मेरी भावदशा के साथ एक्राग हो चुकी थी । अचानक मेरे रुकते ही बोली, " जरुरी भी है, क्योंकि हो  सकता है भेड़ गलत रास्ता चुन ले और भटक जाए । " अनायास ही मेरी आवाज़ तेज गयी और बोली," और चूँकि तुम सब साथ -साथ चल रहे हो, इसलिए सही चल रहे हो । तब ही तो, जब भी मौका लग जाता है,  मंदिर फूँक देते हो, मस्जिद गिरा देते हो । अमिता इकट्टठा होकर चलना , सही होने की निशानी नहीं है । और जहाँ तक मैं सोचती हूँ, समाज हमेशा गलत होता है, लेकिन बहुसंख्यक होता है इसलिए हमेशा सही होता है । लेकिन व्यक्ति  जब भी पैदा होता है हमेशा सही  होता है  । औऱ  उसकी निशानी यह है कि समाज, सुकरात जब जिन्दा होता है तो ज़हर पिलाता है और जब मर जाता है तो क़िताबों मे लिखवा देता है " Socratees  can never die " ईसा ज़िन्दा होता है तो उसे सूली देते हैं और जब मर जाते हैं, तो उसे भगवन का बेटा  बना देते हैं । जब मीरा नाचती है, तो ज़हर का प्याला मिलता है, और जब कृष्ण मे लीन हो जाती है तो उसके भगवत -प्रेम के गुण गाये जाते है, सन्तों मे चर्चा होती है, मैं कितने उदाहरण गिनाऊँ तुझें । " जल्दी-जल्दी बोलने के कारण थोड़ी-सी थकान आ गयी थी । सो थोड़ा रुकी और फिर बोली, " अमिता समाज हमेशा अतीत मे जीता है, व्यक्ति जब भी पैदा होता है, वह वर्तमान मे जीने की कोशिश करता है । परिणामस्वरूप वह तोड़ता है सड़ी - गली परम्पराये । तब समाज को लगता है । अरे !हमारा जैसा व्यक्ति और हमसे आगे, ऐसा कैसे संभव ? शायद इसीलिए हमारी धरती के जितने भी महापुरुष हैं, सबका इतिहास उठा लो, वर्तमान सभी का दुखद होगा । लेकिन समाज ने उनकी इतनी पूजा की है कि हम उस भयानक सत्य के बारे मे सोच भी नहीं सकते । जबकि सुकरात को हजारोँ लोगोँ की भीड़ मे  नंगे पैर, फटे कपड़ों मे, अपराधियों की तरह ले जाया जा रहा होग। कि  ईसा को दो चोरों के बीच मे कीलें गाड़कर लटकाया होगा । हम सभी को इनके बारे मे ऐसे बताया जाता है जैसे कि यह सब इन पर बीता ही नहीं है, यह सब इन्होँने भोगा ही नहीं है । बल्कि यह सब कपोल-कल्पनायें हैँ । क्योंकि वास्तव मे, अगर इन्होंने भोगा था । तो प्रश्न उठेगा, कौन थे वो लोग, जिन्होंने इतने सज्जन लोगोँ को भी सताये बिना नहीं छोड़ा ? वो लोग इस धरती से बाहर के तो लोग थे नहीं । बल्कि वे इस तथाकथित समाज के सुसंस्कृत लोग ही होँगे । जो युग के विकास के साथ - साथ स्वयंम्  के भी विकसित होने का पाखंड करते हैं । और ये विकसित, पढ़ें - लिखे, सुसंस्कृत लोग हजार रुपयोँ मात्र के लिए एक अनमोल बेटी को जला देते हें, दंगा करवाते हैं, युद्ध करवाते है । मैं अगर प्रेम-विवाह कर लूँ, तो ये समाज, जिसे तुम कह रही हो भटकने से बचाता  है, उन्हेँ और मुझें, मौका लगते ही, जिन्दा जलवा दे । इसलिए, प्लीज यह बात तो कहो ही मत कि समाज भटकने से बचाता है । आग लगती है यह सुनकर । लगता है पकड़ लूँ , समाज के एक-एक ठेकेदार को और गिरेवान को पकड़कर  पूँछू । कि  समाज मे लाखों वैश्याएँ कैसे पल रही हैं ? जबकि तुम्हारे यहाँ तो अधिकतर विवाह, पारम्परिक विवाह हो रहे है, तुम्हारे यहाँ तो सभी एक पत्नीनिष्ठ हैं । इन लाखों वेश्याओं और कॉलगर्लों का पेट कौन पाल रहा है ? तुम या तुम्हारा बाप । रोज़ हजारों लड़कियाँ  बाजार मे आ रही हैं । इन सबके निर्वाह के लिए क्या सरकारी ख़ज़ाने से कोई इंतज़ाम है ?"------- मैँ अमिता के हाथ को झकझोरते हुए बोली, " तुमने कल अखबार पढ़ा था ? ४५ % कामकाजी महिलाओं के साथ छेड़खानी और व्यभिचार होता है । ये सब क्या विदेशी और पश्चिम से आयात हुए लोग ही करते हैं ? यहाँ कोई पारम्परिक विवाही पुरुष तो कुछ करता ही नहीं होगा । अरे ! आधे से ज्यादा रोग तो इस पारम्परिक विवाह ने फैलायें हैं  मर्द की बाप के सामने हिम्मत होती नहीं ।  पिताजी के कहने से शादी कर ली, लड़की पसन्द नहीं आयी, तो पड़े रहने दिया घर मे और बाहर गुलछर्रे उड़ाना शुरू कर दिया । फिर पारम्परिक विवाह है तो परम्परायें भी निभायी जायेंगी । सो परंपरा भी निभ रही है एक लाख मे या चार लाख मे । बेटी के बाप पर नहीं, फिर भी देना तो पड़ेगा, राज़ी नहीं तो गैर राज़ी, चाहेँ क़र्ज़ लेकर लेकर आये । भई  परंपरा है तो वंश चलाने की । सो हमारे यहाँ वंश परंपरा का चमत्कार देखो, १९४७ मे ३५ करोड़  थे, आज १०० करोड़ से ऊपर हैं । पचास साल मे ५०% पढ तो नहीं पाये लेकिन जनसंख्या दुगुनी कर ली । " मेरे मुँह से पता नहीं क्या-क्या निकल गया और पता नहीं क्या-क्या और निकल जाता । लेकिन अचानक अमिता मेरे हाथों को दबाते हुए बोली, " बस भई बस, मुझसे गलती हो गयी । जो मैंने समाज की तरफदारी कर ली । लेकिन मोहतरमा, अब मेरा पीरियड लगने वाला है और मैं चली । लेकिन एक बात कहूँ " और उठते हुए बोली , " चाहें कुछ समझ मे आया या न आया but you defined very well that society is sheep 

Wednesday, 1 April 2015

"MERI JAATI KYA HAI ?"

कापी  खोलते -खोलते, अचानक गुड़िया बोली, "UA-61452005-1

Tuesday, 31 March 2015

यमलोक में हड़ताल

यमलोक में हड़ताल

        यमलोक में हड़ताल ? यमराज के पास खबर पहुँची, जानकारी ली गयी कि हड़ताल कहाँ और क्यों है ? जवाब मिला, " नारी विभाग में हड़ताल है |" ," क्यो ?"  " महाराज, यह तो हमें बताया नही गया है, बस एक ही आवाज आ रही है कि हमें यमराजजी से मुलाकात करनी है, उन्हें ही बताया जायेगा | यमराज चकित  | यमलोक के आजतक के इतिहास में यह पहली, अपनी तरह की एक अनूठी घटऩा थी | आजतक "हड़ताल" शब्द सुना ही नही गया था | यमराजजी ने अपने गुप्तचर विभाग के गुप्चचरों से, घटना के बारे में पड़ताल की | तो वो भी कुछ ज्यादा जानकारी नही दे पाये | बस ! इतना पता चला कि महिला विभाग में, जो बलात्कार पीडित्त महिला, यमलोक पहुँची उनकी कुछ समस्या है | अंतत: यमराजजी ने महिला विभाग की उन पीड़ित महिलाओं से मुलाकात करने की योजना बनाई | और उन पीड़ित महिलाओं को यमराजजी से मिलने का समय, अवगत करा दिया गया |
        सभी महिलायें सुनिश्चित समय पर, यमराजजी के सामने पेश हुई | यमराजजी ने आदर  के साथ, उन सभी को अपने दरबार में उचित स्थान पर, आसन दिलवाया | दृश्य बड़ा विहंगम था ! यमराजजी ने देखा कि उनके सामने दो बरस से लेकर २५-३५ बरस की अधिकतर युवतियाँ हैं, ३५ बरस से अधिक आयु की बहुत कम महिला | यमराजजी विस्मित ! फिर भी समस्या तो सुननी थी बोले, " समस्या क्या है ? " उन सभी पीड़ितों में से एक १७-१८ बरस की नवयुवती उठी, बोली," महाराज, मृत्यु कितने तरह की होती है ? " यमराजजी अवाक् ! स्तब्ध ! कुछ देर चुप्पी | फिर बोले," दो तरह की, काल मृत्यु, आयु पूरी होने पर मृत्यु व अकाल मृत्यु, आयु पूरी होने से पहले वाली मृत्यु | युवती का त्वरित सवाल," हमारी मृत्यु काल मृत्यु है या अकाल मृत्यु | यमराजजी," अकाल मृत्यु "," क्यों ? ना हम किसी आपदा की शिकार हुई ना किसी accident का शिकार हुई ? यहॉ २ बरस से लेकर जितनी भी आयु की युवतियाँ है, सब बलात्कार का शिकार हैं और फिर वीभत्स मौत का | ये २बरस की बच्ची तो बलात्कार का मतलब भी नही जानती  महाराज | और हमारा विरोध यह नही है कि हमारी मौत किस तरह हुई है और ना ही हमें इससे मतलब है कि मृत्यु कितने तरह की होती है ? हमारा विरोध तो इस बात से है कि हमें पुन; पृथ्वीलोक पर क्यों भेजा जा रहा है ? एक बार नरक की अति हमने भोग ली है, अब उस सजा को फिर भोगने के लिए हमें क्यों पृथ्वी पर भेजा जा रहा है ?" बात पूरी भी नही हो पाई उस युवती की कि पूरा समूह," हमें नही जाना, हमें नही जाना, हमें नही जाना" के नारों से पूरा दरबार गुंजायमान होने लगा | यमराजजी जैसा कठोर दिल, सतेज  देव, उस समूह को जिसमें २,३,५,६,९,१२,१५,१८ बरस युवतियों की तरफ देख रहे हैं, अवाक् हैं | निज अऩुभव, गूढ़अनुभव, व्यवहारिकता बौनी साबित हो रही है   आज की भीषण समस्या से | निज मन आज आन्दोलित है, मन संदेह से भर गया | तुरन्त मन ही मन निश्चय किया | और उस समूह को चुप करते हुए बोले," आप कृपया चुप रहे, मैं आपके सभी सवालों का उत्तर आज तो नही दे सकता लेकिन दूँगा अवश्य | लेकिन यह पक्का है कि आप पृथ्वीलोक पर नही जायेंगी | आप जब तक चाहें तब तक यहाँ रह सकती हैं, आपको आपकी सहमति के बिना कोई कहीं नही भेजेगा |"
            शायद यही कारण लगता है कि आज भारत में महिलाओं की जनसंख्या का अनुपात  आदमियों से कम है क्योंकि कोई भी निरभया, अभया, दामिनी या आप कोई भी नाम ले ले वो यमलोक गई है तो वापिस पृथ्वीलोक आने के लिए तैयार नही है ,|UA-61452005-1

Friday, 23 December 2011

swadharam ki avdharana

मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है जिसमे पशुता के साथ देवत्व भी समाहित है | अतः अपनी भौतिक संतुष्टि
के वाबजूद, एक उत्कंठा उसमे मौजूद रहती है |जो उसे कुछ और पाने की ओर प्रेरित करती है | यही उत्प्रेरणा उसके मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास को पुष्ट करती जाती है | फलस्वरूप मानव हर दिशा मे, कुछ नवीन कर पाने हेतु प्रयासरत रहता है | इसी विवेकशील प्राणी ने प्रत्येक व्यक्ति मे "चैतन्य की अनुभूति "हेतु  जो दिशा विकसित की, उससे ही मै 'धरम' का अर्थ लेता हूँ |

           यहाँ " चैतन्य की अनुभूति" मे दो शब्द अवश्य हैं | परन्तु जहाँ अनुभूति और चेतना मे भी द्वैत नहीं रहता, वह 'धरम' है, इस प्रगाढ़ अथवा सघन चेतना को धारण करना, 'मेरा धरम है', 'स्वधर्म' है |

          धर्म आत्यंतिक, वैयक्तिक है इसीलिए 'स्वधर्म' ही हो सकता है | 'परधर्म' धर्म नहीं, वरन एक सामाजिक आचरण, एक व्यावहारिकता हो सकता है | जिस प्रकार बिजली, विभिन्न वल्बों,पंखों आदि मे कैद होने पर व्यावहारिक द्रष्टि से भिन्न-भिन्न हो जाती है | लेकिन स्वरूपत विधुत एक है, ऐसा भी नहीं कह सकते | हमें यहाँ विधुत के लिए वेदांत के 'अद्वैत' शब्द को प्रयुक्त करना उपयुक्त होगा | इसी प्रकार, जिस धर्म को मै, आत्यंतिक या वैयक्तिक कह रहा हूँ वह अनुभूति के स्तर पर, अवश्य वैयक्तिक हो रहा है, क्योंकि वह किसी की अनुभूति है | परन्तु जिस समय यह अनुभूति, अनुभूत होती है, उस समय, वह सार्वभौमिक हो जाती है | यही कारण है की धर्म की गंगोत्री मे डुबकी लगाकर निकलने वाला, फिर जाति, भाषा, देश- काल की सीमा से बाहर हो जाता है | और 'अहम् ब्रम्हास्मि', अनहलक, सोहमं का गुंजार, केवल भाषागत भिन्नता का बोध कराता है | लेकिन आचरण के स्तर से, हम सभी को मात्र देखकर ही जान सकते है कि प्रत्येक उसी सचिदानंद की बात कर रहा है जिसके बारे मे, हम मात्र "गूंगे द्वारा खाये गुड" की भांति व्याख्यान दे रहे है |

       लेकिन 'स्वधरम' को जितने शास्त्रीय ढंग से व्याख्यायित श्रीकृष्ण ने 'भग्बदगीता' मे किया है, उतना किसी और ने नहीं | हालाकि, मै मानता हूँ की 'स्वधरम' के आधार पर ही, वैदिक काल मे, वरण-व्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था को उधृत किया गया था | पर मै यह भी मानता हूँ कि यह व्यवस्था 'वैयक्तिक अनुभूति का सामाजीकरण' का प्रयास, वस्तुत कालांतर मे उसका पतन हुआ |  श्रीकृष्ण महाभारत मे मोहग्रस्त अर्जुन को अंत तक यानी अठारह अध्यायों मे, 'स्वधरम' का बोध कराते है | और जैसे ही अर्जुन को 'स्वधरम' का बोध होता है, तो स्वत ही उसकी फलासक्ति, कर्ताभाव, मोहग्रस्तता आदि सभी उद्वेग शांत हो जाते है और वह निर्विकार भाव से युद्ध मे सलंग्न हो जाता है |

      अत 'स्वधरम' का बोध हो जाये, तो धार्मिक आचरण करना नहीं पड़ता, अपितु जीवन ही धर्ममय हो जाता है | लेकिन 'स्वधरम' का बोध हो कैसे ? क्योंकि हर किसी के बालसखा श्रीकृष्ण तो है नहीं | यही पर मै मानता हूँ कि प्रत्येक व्यक्ति को 'स्वधरम' का बोध कराने हेतु, प्रत्येक धर्म मे कुछ क्रियाओं का समावेश अवश्य है |  चाहें  वह इस्लाम का सूफी रहस्यवाद हो, चाहें वह ईसाई धर्म की बपस्तिमा का क्रियाकांड हो, या हिन्दुओं का योग | यह सभी क्रियाएं, मनुष्य के मनस को इस दशा मे ला देती है कि 'स्वधरम' का बोध स्वयं होने लगता है और मनुष्य अपने धर्म का निर्वाह कर, इस संसारूपी महाभारत मे विजयी होने के बावजूद, निर्विकार ही रहता है |UA-61452005-1


Tuesday, 20 December 2011

ek vichar




  • मै  जानता हूँ कि गुत्थी कैसे सुलझेगी ? लेकिन मै सुलझा नहीं सकता, शायद यही संसार है | इससे अच्छी परिभाषा संसार की क्या होगी ? "संसार" लिखा है ये न तो तिरस्कार के लिए लिखा है और न व्यंग के लिए | वरन यह वास्तविकता-सी लगती है | क्योंकि मै सोचता हूँ अगर मै अकेला हूँ, तो कुछ भी करना और न करना मूल्यांकन का विषय ही नहीं है | क्योंकि जो भी हूँ, मै हूँ | लेकिन जहाँ मेरे अतिरिक्त, अन्य भी अस्तित्व रखता है |

वहाँ मै किसी मात्रा मे सही या गलत हो सकता हूँ परन्तु पूरी मात्रा मे सही या गलत नहीं हो सकता | इसलिए दो ही सम्भावनाये है पूरी तरह से सही या गलत होने के लिए | या तो मै सब हो जाऊ या मै ही मै रह जाऊ | अथार्त " अहम्  ब्रह्मास्मि " या "एक तू ही निरंकार" | जो भी पीड़ा है, उसे विश्लेष्ण करके, नाम कोई भी दे दूं लेकिन मूल यही है  कि न तो "मै ही मै बचा है" और "न तू ही तू है"|



UA-61452005-1

















gamestop, pandora, limewire

Monday, 19 December 2011

shajhan ek mumtaz anek

           इश्क  करना वैसे तो शायद जन्मजात आदत ही है | और वक़्त आने पर यह हर युवा के अन्दर पैदा हो जाती है | लेकिन शायद अपने अन्दर यह जन्मजात आदत न होने के कारन कैसे - कैसे दवाब मैंने झेले है, इनको ही लिख रहा हूँ |
           मै जब भी किसी आशिक की इश्क  की दास्ताँ सुनता हूँ | और उनके ऊपर लडकियों द्वारा जान देने की बात  सुनता | तो मन मे मीठे - मीठे सपने अपने - आप ही आने लगते | लकड़ी द्वारा प्यार का इज़हार मुस्कराहट से होता है , यह अधिकतर आशिकों का मत था | इस सदवाक्य को सुनकर मेरा दिल बल्लियों उछलने लगता | क्योकि पता नहीं कितनी लड़कियां  रास्ता चलते,  अपने घर के दरवाजो से, अपनी छतो से,  गाड़ी मे सफ़र करते,  अपनी माताजी के बगल से,  अपनी अमूल्य मुस्कराहट निछावर करती रहती है | पर , जिस समय वो मुस्कराती,  उस समय मेरा वेबकूफ मन चिल्लाकर कहता है," कि बेटा,  बेबकूफ समझकर मुस्कराए जा रही है |" उस समय , इश्क की पहली सीढ़ी पर ही हम मात खा जाते |
           लेकिन बाद मे,  हम आशिकों की सांगत मे, आकर मन को समझा ही लेते कि " सुन्दरियाँ वास्तव मे, हमारे  इश्क मे गिरफ्तार है और हमें भी कुछ सद्प्रयास करने चाहिए |" यह बात मन मे आते ही, हम भी दृढ संकल्प कर लेते कि हम इश्क भी करेंगे तो इससे ही, और शादी भी | शादी क्यों ? क्योकि यह मेरा मत है कि कि जब हमारा किसी से इश्क होता है तो इसका तात्पर्य है कि हमारा उससे पुर्वजनम का सम्बन्ध है (क्योंकि मैं पुर्वजनम को मानता हूँ ) और किसी लड़की से इश्क का मतलब " दोनों लड़की और लड़के का तन, मन और धन से मिलन | और हमारे समाज मे तन, मन और धन से मिलन पति - पत्नी के बीच ही संभव है | इस तरह का दृढ संकल्प करके हम, उस लड़की के घर चक्कर   लगाना  शुरू कर देते | अगर लड़की मिल जाती है , तो हम और वो मुस्कराकर,  आँखों ही आँखों मे बातें कर लेते | लेकिन जब वो अपनी माताजी, पिताजी, अथवा भाईजी के साथ होती,  तो अपने मन ही मन मे दुहराने लगते,  " अरे , अगर किसी ने पूछा, " कि यहाँ क्यों चक्कर लगा रहा है , रे |" तो आँखे निकालकर और कड़क आवाज़ मे कह देंगे , " कि आपके बाप की सड़क तो नहीं है , हम अपने दोस्तों से मिलने जा रहे हैं |"  इतना सोचते ही हमारी सांस धौंकनी की तरह चलने लगती और उस गली का कोई भी आदमी हमारी तरफ देखने लगता | तो मन ही मन सोचने लगते, " कि, बेटा आज तो ये ताड़ गया,  आज तो जरूर मारेगा | " बस हमारे कदम अपने ही आप तेज पड़ने लगते |
            और इस तरह, हमारा इश्क पता नहीं, कितनी बार शुरू हुआ और कितनी बार दम तोड़ गया |  अगर किसी के पास, दिल के अन्दर तक देख लेने वाली दूरबीन हो, तो वो हमारे दिल के अन्दर हजारों ताजमहल देख सकता है | जिसकी हर कब्र मैं दफ़न होने वाला शाहजहाँ तो एक ही है, लेकिन मुमताज़  हर कब्र मे अलग |UA-61452005-1

abhi jee lene do

आज   नहीं, अपितु अभी कुछ लिखा जा सकता है, और वही कोशिश करने की कोशिश कर रहा हूँ | मेरा मानना है कि कभी भी, कही भी, किसी भी भाषा मे जो भी अच्छे से अच्छा पढ़ा  गया है | वह किसी ने लिखा जरूर है परन्तु उसकी संपदा नहीं है | जरूर उतरा है  कोई उसके माध्यम से | मेरा मानना है कि मै वही माध्यम बनने का प्रयास  इस ब्लॉग के द्वारा कर सकू | बस इतना ही | जिसने भी इसे  पढ़ा, उसके लिए धन्यवाद |
UA-61452005-1